क्या होता है स्क्रीन टाइम


स्क्रीन टाइम का मतलब होता है कि बच्चा 24 घंटों में कितने घंटे मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और टैबलेट जैसे गैज़ेट के इस्तेमाल में बिताता है.

अमेरिकन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने बच्चों के स्क्रीन टाइम के संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके मुताबिक़-

@ 18 महीने से कम उम्र के बच्चे स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें.

@18 से 24 महीने के बच्चे को माता-पिता उच्च गुणवत्ता वाले प्रोग्राम ही दिखाएं.

@2 से 5 साल के बच्चे एक घंटे से ज़्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें.

@छह साल और उससे ज़्यादा उम्र के बच्चों के स्क्रीन देखने का समय सीमित हो.

@सुनिश्चित करें बच्चे के पास सोने, फिजिकल एक्टिविटी और अन्य ज़रूरी कामों के लिए पर्याप्त समय हो.

लेकिन, फिलहाल स्थितियां अलग हैं. बच्चे क्लास के अलावा असाइनमेंट, रिसर्च और मनोरंजन के लिए भी मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे उनका स्क्रीन टाइम कहीं ज़्यादा बढ़ गया है.

स्क्रीन टाइम का बच्चों पर असर

स्क्रीन टाइम कम करना अच्छा फैसला है. ज़्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों में कई परेशानियां हो जाती हैं, जैसे-

कभी-कभी सिर में दर्दटीवी या लैपटॉप की स्क्रीन पास जाकर या आंखों को छोटी करके देखना.आंखों में लालपन आनाआंखों को सूखेपन के कारण मसलनाआंखों में जलन होनानज़र कमज़ोर हो सकती है. पहले से जिन्हें चश्मा लगा है उनका नंबर बढ़ सकता है. लेकिन कुछ और बातों का भी ध्यान रखना ज़रूरी है तभी स्क्रीन टाइम कम करने से फायदा होगा. ये बातें हैं-

बैठने की पोजिशन – लैपटॉप या फोन लेटकर ना देखें, कुर्सी और टेबल का इस्तेमाल करें. लैपटॉप या फोन आपकी आंखों के स्तर पर होना चाहिए. स्क्रीन को 33 सेमी. तक की दूरी पर रखें. मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन के असर में कोई खास अंतर नहीं है. दोनों को एक स्टैंड पर रखें जिससे आई लेवल बना रहे.

रोशनी – कई बार बच्चे अंधेरे कमरे में सिर्फ़ लैपटॉप या फोन की रोशनी में ही पढ़ने लगते हैं. लेकिन, ये ध्यान रखें कि कमरे में पर्याप्त रोशनी हो.

ब्रेक लेते रहें – बड़े बच्चों को क्लास के अलावा भी पढ़ने के लिए मोबाइल और लैपटॉप की ज़रूरत होती है. ऐसे में छोटे और बड़े सभी बच्चे बीच-बीच में ब्रेक लेते हैं. पलकों को झपकाएं और कोई दूर की चीज़ देखें. इससे आंखों की मांस-पेशियां को आराम मिलता है.

एंटी ग्लेयर चश्मा – जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज़्यादा है वो एंटी ग्लेयर चश्मे का इस्तेमाल करें. लेकिन, ये बिलकुल भी ना सोचें कि इस चश्मे के इस्तेमाल के बाद जितना चाहें उतनी स्क्रीन देख सकते हैं. ये सुरक्षा का एक तरीक़ा है लेकिन सीमित स्क्रीन टाइम के साथ है |

बच्चों पर मानसिक प्रभाव स्क्रीन टाइम बढ़ने के मानसिक प्रभाव पर मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि “कुछ स्टडीज़ के मुताबिक़ अगर बच्चे या किशोर छह या सात घंटे से ज़्यादा स्क्रीन पर रहते हैं तो उन पर मनोवैज्ञानिक असर हो सकता. इससे उनमें आत्मसंयम की कमी, जिज्ञासा में कमी, भावनात्मक स्थिरता ना होना, ध्यान केंद्रित ना कर पाना, आसानी से दोस्त नहीं बना पाना, जैसी समस्याएं हो सकती हैं.”

“हालांकि, ये इस पर भी निर्भर करता है कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं, फ़िल्म, वीडियो, गेम, सोशल मीडिया देख रहे हैं या कुछ पढ़ रहे हैं. इनका असर बच्चे के अनुसार अलग-अलग हो सकता है.” मोबाइल और लैपटॉप के ज़्यादा इस्तेमाल से बच्चों की आदत में भी बदलाव आ रहा है. शैक्षणिक वीडियो और व्हटासऐप में बातचीत को लेकर उनकी सक्रियता बढ़ गई है.फोन और लैपटॉप की आगे चलकर ये आदत बड़ी समस्या बन सकती है. जब स्कूल शुरू हो जाएंगे तो बच्चों की आदत बदलने में मशक्कत करनी पड़ सकती है. अमूमन बच्चे और खासतौर पर डिप्रेशन, सोशल एंग्ज़ाइटी या हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर से ग्रस्त बच्चे, स्क्रीन को लेकर ज़्यादा आकर्षित होते हैं. जिन बच्चों में सोशल एंग्ज़ाइटी होती है, उन्हें सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ाना ज़्यादा पसंद आता है क्योंकि वहां कोई आपको देख नहीं सकता.

क्या सावधानी रखें ?

– कंप्यूटर ऐसी जगह पर रखें जहां से माता-पिता देख सकें कि बच्चा क्या कर रहा है. कोशिश करें कि बच्चा ईयरफोन की जगह स्पीकर का इस्तेमाल करे.

– बच्चे स्पष्ट निर्देशों को ज़्यादा समझते हैं, जैसे कब और कितने समय के लिए उन्हें लैपटॉप या मोबाइल मिलेगा. स्कूल के काम के अलावा लैपटॉप या मोबाइल देखने के क्या नियम होंगे, ये पहले तय कर लें.

– बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी जैसे कसरत, साइकिल चलाना या चलने-दौड़ने वाले खेल खिलाएं.

– कई ऐप बताते हैं कि मोबाइल में किस ऐप पर कितना समय बिताया गया है. इससे आप देख सकते हैं कि बच्चे ज़्यादातर क्या देख रहा है.


5 Comments Add yours

  1. Anonymous says:

    sahe kaha sahab

    Liked by 1 person

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