जिंदगी आन लाइन


मानव सभ्यता के इतिहास में यह पहला मौका है, जब दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में ट्रेन, बस-कार और विमान सेवाएं बंद हैं लेकिन ज़िंदगी चल रही है। घर-दफ्तर के बहुत सारे काम हैं जो पहले कहीं आए-जाए बिना मुमकिन नहीं थे, पर अब घर बैठे-बैठे हो रहे हैं। शायद ही कोई स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी ऐसी हो जहां छात्र और शिक्षक वास्तविक रूप में उपस्थित हों, लेकिन वे आमने-सामने हैं और पढ़ाई व परीक्षाओं का सिलसिला जारी है।

पेशेवर ज़िंदगी की रूपरेखा बदलने वाले इस मौके ने हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी यह कहने के लिए मजबूर कर दिया कि इन दिनों घर हमारे नए ऑफिस और इंटरनेट नया मीटिंग रूम है। सहकर्मियों के साथ ऑफिस ब्रेक या लंच भी वर्चुअल वर्ल्ड का हिस्सा हो गया है। सरकारी हो या प्राइवेट सेक्टर, सभी जगहों पर ज्यादातर बैठकें ऑनलाइन संपन्न हो रही हैं। आम लोगों की जिंदगी में भी ये ऑनलाइन हलचल तेज़ है। वे फिल्म देखने के ऑनलाइन मंचों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं, कविता, कहानी लिखने से लेकर अपनी गायन, नृत्य और पकवान कलाओं का प्रदर्शन सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर कर रहे हैं।

वर्क फ्रॉम होम की जिस अवधारणा को अभी तक फुटकर में अपनाया जाता था, कोरोना के संकट ने साबित कर दिया है कि अगर इस वर्क कल्चर के कायदों को सलीके से अपनाया जाता तो आपदाओं में लगने वाले हर किस्म के झटकों को हम आसानी से सह जाते।

नया कारोबारी मॉडल  असल में, कोविड-19 यानी कोरोना वायरस के प्रहार से बचने की ज़रूरतों के मद्देनजर इन दिनों दुनिया में जो नए शब्द प्रचलित हुए हैं, उनमें सबसे ज्यादा उल्लेख ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का हुआ है। पहले जिस सोशल डिस्टेंसिंग को एक खराब चीज के रूप में दर्ज किया जा रहा था, कोरोना ने दूसरों से फासला बनाए रखने को बीमारी के फैलाव से बचाव के एक अहम टूल में बदल दिया है। लॉकडाउन के दौरान जीवन की गाड़ी के पहिए पूरी तरह थम न जाएं, इसके लिए कुछ अनिवार्य सेवाओं को जारी रखना ज़रूरी था। इसके तमाम इंतज़ाम भी किए गए। साथ में, वे प्रबंध भी सामने आए कि अगर किसी रोज़ हमारी दुनिया को चलाए रखने के पारंपरिक तौर-तरीकों को कोई ग्रहण लग जाए तो उस दौर में भी कोई कामकाज रुकता-ठहरता नज़र न आए। इस प्रबंध का संबंध घर से ही इंटरनेट के ज़रिए कामकाज निपटाने से है, जिसे पिछले दो दशकों में ऑनलाइन टिकट बुकिंग-रिजर्वेशन से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक के कई किस्सों में देखा-परखा और आज़माया गया है।



ऑनलाइन शॉपिंग की अवधारणा  बीते कई दशकों से मौके-बेमौके इसकी चर्चा इस रूप में होती रही है कि अगर ऑनलाइन शॉपिंग की जा सकती है तो पूरे दफ्तरी कामकाज के आधे हिस्से को इस तरीके से निपटाया ही जा सकता है। शहरों में भयानक प्रदूषण फैलने, ऑड-ईवन जैसे फॉर्मूले अपनाने, ट्रैफिम जाम में फंसने और भारी बारिश-बाढ़ जैसे हालात में दिल्ली-मुंबई आदि शहरों में अक्सर इसकी वकालत की गई है कि दफ्तरी किस्म के जो काम घर बैठे कराए जा सकते हैं, उन्हें इसकी इजाज़त दी जानी चाहिए। महंगी होती कारोबारी जगहों, बिजली की बढ़ती खपत और आने-जाने में वक्त की बचत के अलावा अक्सर यह दलील भी दी गई है कि अगर कुछ प्रतिशत लोगों को वर्क फ्रॉम होम की इजाज़त दे दी गई होती तो यह हमारी पृथ्वी के ऊपर बहुत बड़ा रहम होता। लाखों लोगों के घर से काम करने की इस कोशिश का क्या सुखद अंजाम निकल सकता है |

इन दिनों हमारे देश समेत पूरी दुनिया ने यह देखा है। नीले हुए आसमान की नीचे चमकती पर्वत चोटियों और खुशनुमा मौसम, चिड़ियों की चहचहाहट और समुद्री – वन्य जीवों की बेतकल्लुफ चहलकदमी ने साबित कर दिया है कि इंसान अगर कुछ वक्त के लिए अपने घरों में ठहर जाए तो पूरी कायनात में जैसे नई हरकत पैदा हो जाती है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि धुरी पर टिकी हमारी धरती की चाल में पैदा होने वाले कंपनों में भी उल्लेखनीय कमी आई है। यह सारा करिश्मा सिर्फ इसलिए हुआ है कि इंसान की जि़ंदगी पहले से कई गुना ज्यादा ऑनलाइन हो गई है।,

बैंकिंग कामकाज जारी हैं, शेयर बाजारों में भी सतत उठापटक हो रही है। सबक यह है कि सरकारें अपने स्तर पर जितने काम ऑनलाइन कर सकती हैं- उन्हें तत्काल ऐसा कर देना चाहिए। वर्क फ्रॉम होम के फायदे भी  कोरोना संकट के इस दौर ने यह दिखाया है कि टेलीवर्किंग यानी घर से काम करने का चलन सिर्फ इसलिए ज़रूरी नहीं है कि कंपनियों को महंगे होते जा रहे दफ्तरी इलाकों की समस्या से निपटना है बल्कि शहरों में घर-दफ्तर के बीच बढ़ती दूरियों, ट्रैफिक जाम और परिवहन के बढ़ते खर्चों जैसी कई समस्याओं का हल भी खोजना है। कहा जा रहा है कि निकट भविष्य में ज्यादातर कामकाज ऐसी प्रवृति के होंगे, जिनके लिए लोगों को दफ्तर नहीं जाना पड़ेगा।

निश्चय ही, वर्क फ्रॉम होम के इस चलन पर कई सवाल रहे हैं, पर मौजूदा ज़रूरतों के मद्देनजर इसे लेकर कायम नज़रिये में बदलाव लाने की ज़रूरत है।

जिन पेशों में ग्राहक और कर्मचारी का आमना-सामना ज़रूरी नहीं है, कम से कम वहां तो वर्क फ्रॉम होम की यह सुविधा धन और ऊर्जा बचाने के अलावा सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव कम करने और प्रदूषण घटाने में भी मददगार साबित हो सकती है। लोगों को कंपनियों से जोड़े रखने, कार्यालयों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाने और एक बेहतरीन कार्य संस्कृति विकसित करने में घर से काम करने का तरीका काफी मददगार है। कई अध्ययनों में भी यह साबित हुआ है कि जब लोगों को मनचाहे वक्त और स्थान से काम करने की आज़ादी दी जाती है, तो वे उस माहौल में ज्यादा बेहतरीन परिणाम दे पाते हैं। मुमकिन है कि जिस तरह ऑड इवन कारों के संचालन से ट्रैफिक के दबाव और प्रदूषण को कम करने के बारे में योजनाओं को अमल में लाया गया है, उसी तरह वर्क फ्रॉम होम के विचार को भी एक बार अमल में लाकर उसके नतीजे देखे जाएंगे। यह वक्त कामकाजी ऑनलाइन जिंदगी को लेकर कायम कुछ भ्रांतियों को तोड़ने का भी है।


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  1. Anonymous says:

    Nice

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